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पत्नी की मौत, न्याय की गुहार और समझौते का दबाव! हंसराज हॉस्पिटल प्रकरण में पुलिस पर गंभीर आरोप

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अन्नू की मौत के बाद ‘मैनेज’ का खेल! हंसराज हॉस्पिटल पर लापरवाही के आरोप, सिपाही पति पर समझौते का दबाव

मौत के बाद मातम नहीं, ‘मैनेज’ का खेल! हंसराज हॉस्पिटल पर सवाल, सिपाही पति पर समझौते का दबाव

मोहम्मद नईम

कुशीनगर। जिले के कसया थाना क्षेत्र गोपालगंज स्थित हंसराज हॉस्पिटल में कथित चिकित्सकीय लापरवाही से अन्नू यादव की मौत के बाद अस्पताल की चौखट पर सिर्फ मातम नहीं था, बल्कि मामला दबाने और ‘मैनेज’ करने की कोशिशों के आरोपों ने पूरे घटनाक्रम को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। आरोप है कि महिला की मौत के बाद पुलिस की मौजूदगी में अस्पताल प्रबंधन की ओर से मामले को समझौते के जरिए खत्म कराने की कवायद घंटो चलता रहा। सूत्र बताते है कि हास्पिटल प्रबंधन का प्रभाव इस कदर रहा कि थानाध्यक्ष ने भी मृतका के पति एवं पर्यटन चौकी पर तैनात सिपाही प्रमोद यादव पर समझौते का दबाव बनाया। यह बात दीगर है कि पीडित पर न तो मोटी रकम और दबाब का असर काम नही आया। ऐसे मे यह आरोप सही है तो सवाल सिर्फ हंसराज हॉस्पिटल में हुई मौत का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर है जिसमें इलाज पर उठे सवालों के बाद जांच से पहले ही ‘मैनेजमेंट’ की पटकथा लिखे जाने का आरोप लग रहा है।

बतादे कि पर्यटन थाना कुशीनगर मे तैनात आरक्षी व बलिया जिले के धनपालिया निवासी प्रमोद यादव अपनी 28 वर्षीय पत्नी अन्नू यादव को उपचार के लिए कसया क्षेत्र के नेशनल हाईवे-28 स्थित हंसराज हॉस्पिटल लेकर पहुंचे थे। आरक्षी प्रमोद का आरोप है कि इलाज के दौरान उनकी पत्नी की लगातार हालत बिगड़ती रही, किन्तु हास्पिटल के जिम्मेदारो ने समय रहते उचित उपचार नहीं किया। नतीजतन उसकी मौत हो गई। मौत की खबर मिलते ही अस्पताल परिसर में परिजनों का आक्रोश फूट पड़ा। बेशक! यह घटना अकेली मानकर नजरअंदाज कर देना आसान है, लेकिन कुशीनगर में निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान मौत और उसके बाद उठने वाले सवालों की लगातार हो रही पुनरावृत्ति अब स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी पर बड़ा प्रश्नचिह्न बन गया है।


मौत हुई, हंगामा हुआ और फिर मामला ‘मैनेज’ होने की चर्चा

कहना ना होगा कि निजी अस्पताल में किसी मरीज की मौत होती है। परिजन लापरवाही का आरोप लगाते हैं। अस्पताल के बाहर भीड़ जुटती है। पुलिस पहुंचती है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी कार्रवाई का भरोसा देते हैं। फिर कुछ दिन गुजरते हैं और मामला धीरे-धीरे सुर्खियों से गायब हो जाता है।

यह महज संयोग है या व्यवस्था की कोई ऐसी खामी , जिसका फायदा अस्पताल प्रबंधन उठा रहे हैं?

परिजनों पर समझौते का दबाव बनाने और मामलों को शांत कराने के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है, लेकिन यदि प्रशासन वास्तव में पारदर्शी व्यवस्था चाहता है तो ऐसे हर मामले में मेडिकल रिकॉर्ड सील, स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड से जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?


स्वास्थ्य विभाग की निगरानी पर बड़ा सवाल

जिले में निजी अस्पतालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। लेकिन सवाल यह है कि मरीजों की संख्या के साथ निगरानी भी बढ़ी या नहीं?कितने निजी अस्पतालों का नियमित निरीक्षण होता है?कितने अस्पतालों में आपातकालीन सुविधाएं मानक के अनुरूप हैं? कितने चिकित्सक वास्तव में निर्धारित समय पर उपलब्ध रहते हैं?इलाज के दौरान हुई मौतों की कितनी शिकायतों की स्वतंत्र जांच हुई?और सबसे अहम कितने मामलों में दोषी चिकित्सक अथला अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई की गई है?अगर इन सवालों का जवाब स्वास्थ्य विभाग के पास नहीं है तो फिर निजी अस्पतालों की निगरानी आखिर किसके भरोसे है?

पुलिस की कार्रवाई भी सिर्फ पंचनामा तक सीमित

जानकार कहते है कि मरीज की मौत के बाद शव पोस्टमार्टम के लिए भेज देना जांच की शुरुआत है, अंत नहीं। यदि परिजन चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगा रहे हैं तो पुलिस को अस्पताल की केस शीट, प्रिस्क्रिप्शन, जांच रिपोर्ट, दवाओं का रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज और ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सकों का विवरण सुरक्षित कराकर जांच का हिस्सा बनाना चाहिए।वरना हर बार की तरह यही होगा कि मरीज मर, परिवार खूब रोया, पुलिस मौके पर आई, हो-हल्ला मचा, पोस्टमार्टम हुआ और फाइल बंद हो गयी।


पत्नी की अस्पताल में मौत, पति पर समझौते का दबाव?

अन्नू यादव की मौत के बाद उठे सवाल अब सिर्फ हंसराज हॉस्पिटल में कथित चिकित्सकीय लापरवाही तक सीमित नहीं हैं। मामला पुलिस की भूमिका तक पहुंच गया है। परिजनों के मुताबिक अन्नू का उपचार हंसराज हॉस्पिटल में चल रहा था, जहां उसकी हालत बिगड़ने के बाद मौत हो गई। परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन पर इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया है।लेकिन इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब मृतका का पति खुद पुलिस विभाग में सिपाही है और पर्यटन चौकी पर तैनात है, तब यदि उसी पर मामले को समझौते से खत्म करने का दबाव बनाया गया, तो आम पीड़ित परिवारों के साथ क्या होता होगा?

पुलिसकर्मी ने ही व्यवस्था पर उठाया सवाल, जांच जरूरी

सूत्रों का दावा है कि कथित दबाव से परेशान प्रमोद यादव ने पुलिस अधीक्षक को संबोधित इस्तीफा देने का पत्र लिख डाला। यह दावा सही है तो मामला बेहद गंभीर है। क्योंकि यहां सवाल किसी आम नागरिक पर दबाव का नहीं, बल्कि पुलिस विभाग में तैनात सिपाही के कथित तौर पर अपनी ही विभागीय व्यवस्था से परेशान होने का है।अगर समझौते के लिए दबाव नहीं बनाया गया तो सिपाही ने इस्तीफा के लिए पत्र की बात क्यों लिखा? क्या पुलिस अधिकारियों ने उस पुलिसकर्मी की वेदना महसूस करने की कोशिश की?क्या पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच होगी?इन सवालों का जवाब पुलिस विभाग को देना चाहिए।


बड़ा सवाल :जांच अस्पताल की होगी या समझौते की

हंसराज हॉस्पिटल में महिला की मौत की निष्पक्ष जांच के साथ-साथ यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि क्या मृतका के पति पर किसी पुलिस अधिकारी ने समझौते के लिए दबाव बनाया था? यदि आरोप गलत हैं तो जांच से स्थिति साफ हो जाएगी और यदि दबाव बनाया गया था तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।मामले में अस्पताल प्रबंधन का पक्ष सामने आना बाकी है। वहीं पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ इलाज से जुड़े सभी दस्तावेज, अस्पताल की केस शीट और परिजनों के आरोपों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।

अन्नू की मौत का सच जांच से ही सामने आएगा लेकिन सवाल यह है कि न्याय मांग रहे उसके पुलिसकर्मी पति को न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ेगा या कथित तौर पर समझौते के लिए दबाव झेलना पड़ेगा।

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